क्वॉड से अमेरिका के बदलते रुख के बीच भारत का बड़ा रणनीतिक दांव
अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति के गलियारों में इस समय भूचाल सा आया हुआ है। वैश्विक सुरक्षा मंचों पर अमेरिका की प्राथमिकताओं और रणनीतिक झुकाव में आ रहे बदलावों के बीच भारत ने एक बेहद दूरदर्शी और आक्रामक कूटनीतिक कदम उठाया है। फिलीपींस के सेब्यू शहर में आयोजित हो रहे महत्वपूर्ण एडीएमएम-प्लस (ADMM-Plus) कॉन्क्लेव के दौरान भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कड़ा रुख अपनाते हुए एशियाई सुरक्षा ढांचे को नई दिशा दे दी है। एक ओर जहां यह चर्चाएं जोर पकड़ रही हैं कि वाशिंगटन यानी अमेरिका अपनी वैश्विक व्यस्तताओं और प्राथमिकताओं के चलते पारंपरिक 'क्वॉड' (Quad) यानी भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया गठबंधन से धीरे-धीरे दूरी बना रहा है या अपनी सक्रियता कम कर रहा है, वहीं दूसरी ओर भारत ने क्षेत्र में रणनीतिक शून्यता को भरने के लिए जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत के त्रिपक्षीय सहयोग यानी 'JAI' (जापान-ऑस्ट्रेलिया-इंडिया) अलायंस को और अधिक धार देने का स्पष्ट ऐलान कर दिया है। रक्षा मंत्री के इस मास्टरस्ट्रोक ने इंडो-पैसिफिक रीजन में यह साफ संदेश दे दिया है कि भारत अपनी सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए किसी एक महाशक्ति पर निर्भर रहने के बजाय बहुपक्षीय विकल्पों को मजबूत करने में पूरी तरह सक्षम है।
वैश्विक सुरक्षा मंच पर अमेरिका का बदलता रुख और भारत की तैयारी
पिछले कुछ महीनों से वैश्विक कूटनीतिक विश्लेषक इस बात पर बारीक नजर बनाए हुए थे कि अमेरिकी प्रशासन की बदलती नीतियां क्वाड गठबंधन को किस दिशा में लेकर जा रही हैं। पश्चिमी देशों की आंतरिक राजनीति, यूरोप और पश्चिम एशिया के चल रहे गंभीर संघर्षों के कारण अमेरिका का ध्यान कई मोर्चों पर बंट चुका है। ऐसी सुगबुगाहटें तेज थीं कि अमेरिका क्वाड को लेकर पहले जैसी आक्रामक और निरंतर प्राथमिकता शायद न रख पाए। इस स्थिति को भांपते हुए भारत ने कूटनीतिक रूप से पिछड़ने के बजाय खुद पहल की कमान अपने हाथ में ले ली है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एडीएफएम-प्लस की बैठकों के इतर क्वाड देशों के अपने समकक्षों के साथ मैराथन और बेहद अहम बैठकें कीं। इन वार्ताओं के दौरान यह सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया कि यदि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में मुक्त, खुले और समावेशी माहौल को बनाए रखना है, तो क्षेत्रीय देशों को अपनी ताकत औरसीमित समझौतों से आगे बढ़कर आपसी रक्षा साझीदारी को और अधिक मजबूत करना होगा। अमेरिकी उदासीनता की चर्चा के बीच भारत का यह कदम इस बात का प्रमाण है कि नई दिल्ली क्षेत्रीय सुरक्षा के मामले में अब किसी भी प्रकार के रणनीतिक गैップ या ढिलाई के पक्ष में बिल्कुल नहीं है।
'JAI' (जापान-ऑस्ट्रेलिया-इंडिया) अलायंस का हुआ आधिकारिक ऐलान
क्वाड के समानांतर या उसके एक मजबूत पूरक विकल्प के रूप में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा 'JAI' (Japan-Australia-India) समीकरण को फिर से प्रमुखता से सामने लाना ड्रैगन यानी चीन के लिए एक गहरी चिंता का विषय बन गया है। इस त्रिपक्षीय विन्यास में जापान और ऑस्ट्रेलिया दोनों ही भारत के ऐसे भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार हैं जिनके हित इंडो-पैसिफिक में चीन के आक्रामक विस्तारवाद से सीधे तौर पर टकराते हैं। इस उच्च स्तरीय मंच पर यह स्पष्ट किया गया कि एशियाई सुरक्षा को बनाए रखने के लिए अब एशिया के इन प्रमुख लोकतांत्रिक देशों को अपनी सैन्य और खुफिया साझीदारी को जमीन पर उतारना होगा। इस अलायंस के तहत मैरीटाइम सिक्योरिटी यानी समुद्री सुरक्षा, नौवहन की स्वतंत्रता, अत्याधुनिक सैन्य तकनीकों का आदान-प्रदान और हिंद महासागर तथा दक्षिण चीन सागर में संयुक्त गश्त जैसे मुद्दों पर काम तेज किया जाएगा। रक्षा जानकारों का मानना है कि 'JAI' का यह ऐलान इस बात का साफ संकेत है कि भारत ने अमेरिका के बिना भी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षा का एक मजबूत और स्वदेशी रक्षाचक्र तैयार करने की रूपरेखा खींच दी है, जो किसी भी बाहरी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है।
ड्रैगन को मिला कड़ा संदेश और चीन की कूटनीतिक विफलता
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि इस अहम रक्षा सम्मेलन से चीन नदारद नजर आया या यूं कहें कि उसने अपनी तरफ से किसी भी ministerial (मंत्री स्तर की) उपस्थिति से परहेज किया और केवल एक मामूली डिफेंस अटैच को ही भेजकर औपचारिकता पूरी की। चीन की इस अनुपस्थिति पर कटाक्ष करते हुए और बीजिंग को सीधा संदेश देते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कड़े शब्दों में स्पष्ट कर दिया कि भारत अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। चीन द्वारा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में लगातार अपनी नौसैनिक ताकत बढ़ाने और छोटे देशों को डराने-धमकाने की नीतियों के जवाब में भारत ने जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर जो घेराबंदी तैयार की है, उससे बीजिंग की नींद उड़ना तय है। ड्रैगन अच्छी तरह जानता है कि अमेरिका की मौजूदगी के बिना भी अगर भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया त्रिपक्षीय मोर्चे पर एक साथ मिलकर डिफेंस कोऑपरेशन को अमलीजामा पहनाने लगे, तो दक्षिण चीन सागर से लेकर मलक्का जलडमरूमध्य तक चीनी नौसेना की राह बेहद कठिन हो जाएगी। राजनाथ सिंह का यह आक्रामक और आत्मविश्वास से भरा रुख यह बता नया भारत है, जो आंख में आंख डालकर बात करना अच्छी तरह जानता है।