मुनीर को हिंदुओं से नफरत है...मरदसे के लिए पंजाब में गिराया 100 साल पुराना...
दुनिया के किसी भी कोने में जब धार्मिक स्थलों और आस्था के केंद्रों को निशाना बनाया जाता है, तो मानवता और सहिष्णुता की नींव हिल जाती है। पड़ोसी देश पाकिस्तान से एक बार फिर से अल्पसंख्यकों के अधिकारों को कुचलने और उनकी आस्था को ठेस पहुंचाने वाली बेहद शर्मनाक और दिल दहला देने वाली खबर सामने आई है। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में एक साजिश के तहत सौ साल पुराने ऐतिहासिक प्राचीन मंदिर को पूरी तरह से जमींदोज कर दिया गया है। इस वीभत्स कृत्य के पीछे किसी और का नहीं बल्कि कट्टरपंथी ताकतों और वहां के हुक्मरानों का हाथ बताया जा रहा है, जिनमें सेना प्रमुख जनरल मुनीर की नीतियों और उनकी हिंदू विरोधी मानसिकता का खुलकर विरोध हो रहा है। इस प्राचीन मंदिर को इसलिए गिरा दिया गया ताकि उसी पवित्र जमीन पर एक नए मदरसे का अवैध निर्माण किया जा सके। इस घटना ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि पड़ोसी मुल्क में गैर-मुसलमानों की संस्कृति, इतिहास और धार्मिक धरोहरों की कोई कीमत नहीं है और उन्हें मिटाने के लिए हर हद पार की जा रही है।
100 साल पुरानी धरोहर और इतिहास का मर्डर
किसी भी समाज की पहचान उसकी संस्कृति और उसके इतिहास से होती है, लेकिन जब नफरत की आंधी चलती है तो इतिहास के पन्नों को भी जलाकर राख कर दिया जाता है। पंजाब प्रांत में तोड़ा गया यह मंदिर कोई आम इमारत नहीं थी, बल्कि यह करीब एक सदी यानी सौ साल पुराना ऐतिहासिक और सांस्कृतिक केंद्र था। इस मंदिर की दीवारों पर उकेरी गई कलाकृतियां और यहां की वास्तुकला उस दौर की गवाही देती थी जब इस क्षेत्र में विभिन्न धर्मों के लोग आपसी भाईचारे के साथ रहा करते थे। बुजुर्ग स्थानीय लोग बताते हैं कि इस मंदिर से उनकी कई पीढ़ियों की भावनाएं जुड़ी हुई थीं। लेकिन कट्टरता और पूर्वाग्रह से ग्रसित तत्वों ने अपनी सनक के आगे इस अनमोल धरोहर को नेस्तनाबूद करने में एक पल की भी झिझक नहीं दिखाई। बुलडोजर की मदद से इस प्राचीन मंदिर को मलबे के ढेर में बदल दिया गया और उसकी ईंट से ईंट बजा दी गई। यह कृत्य सिर्फ एक इमारत को गिराना नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर एक समुदाय की सामूहिक आस्था और पहचान पर सुनियोजित हमला है।
मदरसे के निर्माण के लिए रची गई गंदी साजिश
इस पूरी तोड़फोड़ के पीछे जो नापाक मकसद सामने आया है, उसने हर इंसाफ पसंद इंसान को झकझोर कर रख दिया है। मंदिर को जमींदोज करने का मुख्य कारण वहां एक विशाल मदरसे का निर्माण करना बताया जा रहा है। कट्टरपंथी ताकतों और स्थानीय भू-माफियाओं ने मिलकर यह सुनियोजित षड्यंत्र रचा था ताकि हिंदू अल्पसंख्यकों के धार्मिक चिह्नों को हमेशा के लिए मिटाया जा सके। एक तरफ जहां दुनिया आधुनिकता और सहिष्णुता की ओर बढ़ रही है, वहीं पाकिस्तान के पंजाब में आस्था के केंद्रों को उजाड़कर धार्मिक संस्थानों को बढ़ावा देने का यह खेल खुलेआम खेला जा रहा है। इस बात को लेकर स्थानीय लोगों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं में شدید आक्रोश है कि आखिर किस कानून के तहत और किसकी शह पर एक सौ साल पुराने मंदिर की जमीन पर कब्जा करके वहां निर्माण कार्य शुरू करने की योजना बनाई गई। यह घटना दिखाती है कि सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों और कट्टरपंथियों के बीच किस हद तक सांठगांठ है, जो अल्पसंख्यकों के धार्मिक अधिकारों का गला घोंटने से भी बाज नहीं आते।
जनरल मुनीर और प्रशासनिक तंत्र की हिंदू विरोधी मानसिकता
इस दर्दनाक घटना के सामने आने के बाद से पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर और वहां की प्रांतीय सरकार सीधे तौर पर सवालों के घेरे में आ गई है। विश्लेषकों और मानवाधिकार संगठनों का साफ कहना है कि पाकिस्तान की नीति और नीयत में अल्पसंख्यकों के प्रति गहरी नफरत भरी हुई है। जनरल मुनीर के कार्यकाल में जिस प्रकार से लगातार हिंदू मंदिरों, ईसाई चर्चों और अन्य अल्पसंख्यक धार्मिक स्थलों पर हमले बढ़े हैं, उसने यह स्पष्ट कर दिया है कि राज्य स्तर पर इन्हें संरक्षण प्राप्त है। जब देश की बागडोर संभालने वाले लोग ही पूर्वाग्रह से ग्रसित हों और धार्मिक उन्माद को बढ़ावा देते हों, तो वहां के प्रशासन से न्याय की उम्मीद करना बेमानी हो जाता है। मंदिर गिराए जाने की इस घटना में स्थानीय पुलिस और प्रशासन की चुप्पी इस बात का पुख्ता सबूत है कि उन्हें ऊपर से इस अवैध कृत्य को अंजाम देने की पूरी छूट मिली हुई थी। इस तानाशाही रवैये ने एक बार फिर पूरी दुनिया के सामने पाकिस्तान के उस चेहरे को बेनकाब कर दिया है जो खुद को अल्पसंख्यकों का हितैषी होने का झूठा ढोंग करता है।
भड़का जनमानस और सोशल मीडिया पर फूटा गुस्सा
इस सनसनीखेज घटना के वीडियो और तस्वीरें जैसे ही सोशल मीडिया पर वायरल हुईं, वैसे ही देश-विदेश में पाकिस्तान के खिलाफ विरोध की आग भड़क उठी। भारत सहित दुनिया भर के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, हिंदू संगठनों और सोशल मीडिया यूजर्स ने इस अमानवीय कृत्य की कड़ी निंदा की है। पाकिस्तान के भीतर भी कुछ समझदार और सेक्युलर तबके के लोगों ने इस घटना पर गहरा दुख जताया है और सरकार से दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है। हालांकि, वहां के मुख्यधारा के मीडिया और हुक्मरानों ने इस खबर को दबाने की पूरी कोशिश की ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी किरकिरी न हो, लेकिन सोशल मीडिया के दौर में सच छिप नहीं सका। जनता का यह भड़का हुआ गुस्सा इस बात का प्रतीक है कि अन्याय और अत्याचार की एक सीमा होती है, और जब वह सीमा पार हो जाती है, तो दबी हुई आवाजें बगावत का रूप ले लेती हैं। सौ साल पुराने मंदिर के विध्वंस की यह घटना इतिहास के पन्नों में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो चुकी है, जो हमेशा पाकिस्तान की धार्मिक असहिष्णुता और कट्टरता की कहानी बयां करती रहेगी।