सऊदी अरब की सुरक्षा व्यवस्था चरमराई और मक्का पैक्ट की पहली बड़ी परीक्षा

सऊदी अरब की सुरक्षा व्यवस्था चरमराई और मक्का पैक्ट की पहली बड़ी परीक्षा

मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया के रणनीतिक गलियारों में इस समय जबर्दस्त भूचाल आया हुआ है। यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब के रियाद हवाई अड्डे और ऊर्जा ठिकानों पर हाल ही में किए गए लगातार घातक ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल हमलों ने खाड़ी देश की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। सऊदी अरब की सुरक्षा का जिम्मा उठाने और उसकी ओर से हर मोर्चे पर ढाल बनने का दंभ भरने वाला पाकिस्तान इस संकट की घड़ी में पूरी तरह नाकाम और असहाय नजर आ रहा है। कुछ ही समय पहले सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने मिलकर एक ऐतिहासिक 'मक्का रक्षा समझौता' (Makkah Mutual Defence Pact) हस्ताक्षरित किया था। इस सैन्य संधि का मुख्य उद्देश्य यह था कि तीनों में से किसी भी देश पर हुआ हमला सभी पर हमला माना जाएगा और सामूहिक रूप से उसका मुकाबला किया जाएगा। हालांकि, जब यमन के हूतियों ने सऊदी अरब के बुनियादी ढांचे पर हमले तेज किए और रियाद की 'गर्दन' पकड़ी, तब पाकिस्तान सैन्य रूप से जमीनी कदम उठाने के बजाय पूरी तरह बैकफुट पर आ गया और कूटनीतिक रास्तों की आड़ लेने लगा।

तेहरान में मक्का पैक्ट देशों की हाई-लेवल बैठक और पाकिस्तान की मजबूरी

हूती हमलों की भीषणता और पाकिस्तान की सैन्य सीमाएं सामने आने के बाद मक्का पैक्ट में शामिल देशों को आनन-फानन में ईरान की राजधानी तेहरान का रुख करना पड़ा है। इस उच्च स्तरीय आपातकालीन बैठक में पाकिस्तान के सेना प्रमुख (फील्ड मार्शल) असिम मुनीर, सऊदी अरब के रक्षा मंत्री शहजादा खालिद बिन सलमान और तुर्की के खुफिया प्रमुख इब्राहिम कालिन ने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेزشकियान व शीर्ष ईरानी नेतृत्व से सीधी बातचीत की। रक्षा और कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि जो पाकिस्तान कुछ हफ्ते पहले सऊदी के दुश्मनों को खत्म करने के बड़े-बड़े दावे कर रहा था, वह अब तेहरान की मेज पर बैठकर शांति की गुहार लगा रहा है। पाकिस्तान अपनी खराब आर्थिक स्थिति, घरेलू अस्थिरता और भारत से लगी पूर्वी सीमा पर भारी तनाव के कारण हूतियों या ईरान के खिलाफ सीधी सैन्य कार्रवाई में उतरने से बुरी तरह डर रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब को रक्षात्मक रूप से पंगु बना दिया है और पाकिस्तान इस मामले में महज एक मूकदर्शक या नाकाम वार्ताकार बनकर रह गया है।

1 अरब डॉलर के ऑफर और टेबल टॉक्स के पीछे छुपा बड़ा कूटनीतिक सच

तेहरान में हुई इस सीक्रेट और हाई-स्टेक्स बैठक के बाद जो जानकारियां सामने आ रही हैं, वे चौंकाने वाली हैं। रिपोर्टों के अनुसार, हमलों को रोकने और शांति बनाए रखने के लिए सऊदी अरब ने हूतियों को 1 अरब डॉलर की वित्तीय सहायता देने का एक बड़ा प्रस्ताव रखा है ताकि उनके सार्वजनिक क्षेत्र के वेतन का भुगतान किया जा सके और बुनियादी ढांचे का पुनर्निर्माण हो सके। असिम मुनीर इस बातचीत की मेज पर केवल एक मध्यस्थ के रूप में बैठे नजर आए। एक्सपर्ट्स का कहना है कि जब कोई देश सैन्य समझौते के बावजूद अपने सहयोगी को सुरक्षा देने में नाकाम रहता है, तो उसे पैसे देकर शांति खरीदने का रास्ता अपनाना पड़ता है। हूतियों ने यह साबित कर दिया है कि वे जब चाहें सऊदी अरब के तेल संसाधनों और हवाई अड्डों को निशाना बना सकते हैं। पाकिस्तान की इस विफलता ने खाड़ी देशों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि कागजी रक्षा समझौतों से हकीकत की जंग नहीं जीती जा सकती।

मिडिल ईस्ट में नए समीकरण और मक्का पैक्ट की साख पर लगा दाग

इस पूरे घटनाक्रम ने मध्य पूर्व के सामरिक समीकरणों को पूरी तरह से बदलकर रख दिया है। हूतियों के आक्रामक रुख और पाकिस्तान के आत्मसमर्पण जैसे रवैये ने 'मक्का पैक्ट' की विश्वसनीयता पर बहुत बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। ईरान ने खुद को इस पूरे विवाद में एक केंद्रीय मध्यस्थ के रूप में स्थापित कर लिया है, जबकि पाकिस्तान का परमाणु और सैन्य दंभ पूरी तरह बेनकाब हो चुका है। रक्षा जानकारों का मानना है कि यदि हूती हमलों का दौर इसी तरह जारी रहा और तेहरान में हो रही बातचीत किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंची, तो सऊदी अरब को अपनी सुरक्षा के लिए पाकिस्तान के बजाय फिर से पश्चिमी महाशक्तियों या अन्य विकल्पों का रुख करना पड़ेगा। पाकिस्तान की इस असफलता ने साबित कर दिया है कि वह सऊदी अरब का बचाव करने में पूरी तरह असमर्थ है।